Prayers & Meditations

Hindi · बहाउल्लाह

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*(अल्लाह-ओ-आभा) तीन बार कहे और तब प्रभु के समक्ष अपने घुटनों पर हाथ रखकर वह कमर के

बल झुक जाये और मंगलकारी सर्वोच्च प्रभु की

*स्तुति में कहे :

तू देखता है, है मेरे ईश्वर!

किस प्रकार मेरे अंग-प्रत्यंग

तेरी आराधना के लिये स्पन्दित हो उठे हैं, तेरे स्मरण और गुणगान के लिये

मेरी चेतना समर्पित हुई है; तू देखता है, हे मेरे ईश्वर! किस प्रकार मेरी चेतना ने तेरे आदेश के प्रमाण दिये हैं, जो तेरी वाणी के साम्राज्य और

तेरे ज्ञान की गरिमा से प्रमाणित हैं।

ऐसी अवस्था में, हे मेरे प्रभु!

मैं तुझसे उन सबकी याचना करता हूँ, जो तेरे पास है, ताकि मैं अपनी दरिद्रता दिखा सकूँ और तेरी सम्पन्नता और कृपालुता का बखान कर सकूँ; अपनी शक्तिहीनता की घोषणा कर सकूँ और तेरी शक्तिमानता और सर्वसम्पन्नता प्रकट कर सकूँ !

*तब प्रार्थी खड़ा हो जाये और दो बार अपने हाथ आराधना में ऊपर उठाये तथा कहे :

तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू ही है सर्वसमर्थ, सर्वकृपालु; तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू ही है आदि और अंत का आदेशकर्ता। हे प्रभु! मेरे प्रभु! तेरी क्षमाशीलता ने मुझे साहस दिया है और तेरी दया ने मुझे शक्ति दी है। तेरी पुकार ने मुझे जगाया है और तेरी कृपा ने मुझे उठाया है

और तुझ तक पहुंचने की राह बतलाई है, अन्यथा मैं कौन हूँ, क्या है मेरी शक्ति कि मैं तेरी निकटता के द्वार तक भी पहुँचने का साहस जुटा पाता, या फिर, तेरी इच्छा-शक्ति से प्रस्फुटित प्रकाश की ओर उन्मुख भी हो पाता ? तू देखता है, हे मेरे प्रभु

कि तेरी कृपा के द्वार पर यह निरीह प्राणी दस्तक दे रहा है और तेरी दया के हाथों अमर जीवन-सरिता की घूंट पाने का आकांक्षी बना बैठा है यह नश्वर प्राणी।

ओ समस्त नामों के स्वामी ! तेरा आधिपत्य सदा रहा है। ओ स्वर्गों के रचयिता ! तेरे प्रति समर्पित है मेरा सब कुछ। तब प्रार्थी तीन बार हाथ उठाकर कहे :

*जो कुछ भी महान है, परमात्मा उससे भी महान है ! तब घुटनों के बल बैठकर नतमस्तक हो प्रार्थी कहे : तू उनके भी गुणगान से परे है,

जो तेरी सन्निकटता महसूस करते हैं तू उन भक्तजनों के हृदय-पखेरू द्वारा किये जाने वाले गौरव-गान के भी परे है जो तेरे दिव्य द्वार तक पहुँचने की आशा में तेरे प्रति समर्पित हैं।

मैं साक्षी देता हूँ कि तू समस्त गुणों और नामों से परे परम पावन है।

तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, तू परमोच्च परम प्रकाशित है।

प्रार्थी अब आसन लगाकर बैठ जाये और कहे : मैं प्रमाणित करता हूँ वह सब,

जिसे सभी सृजित वस्तुओं ने प्रमाणित किया है, जिसे प्रमाणित किया है देवदूतों ने, सर्वोच्च स्वर्ग में निवास करने वालों ने, और इन सब के पार महिमामय क्षितिज से स्वयं भव्य वाणी ने कि तू ही ईश्वर है, तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है और जो अवतरित किया गया है वह भी एक गुप्त रहस्य है।

वह एक ऐसा संचित प्रतीक है जिसके द्वारा ”भ“ और ”व“ अक्षर परस्पर जुड़े हैं।

मैं प्रमाणित करता हूँ कि तू ही है वह जिसके नाम का उल्लेख उस सर्वोच्च लेखनी ने किया है

और जिसे इहलोक और परलोक के स्वामी, प्रभु की परम पावन पुस्तक में, अंकित किया गया है। *प्रार्थी तब सीधा खड़ा हो जाये और कहे :

हे सभी प्राणियों के स्वामी !

गोचर और अगोचर सभी वस्तुओं के मालिक ! तू मेरे आँसुओं और मेरे मुख से निकलती आहों को देखता है

और मेरी कराहों और मेरे विलाप को और मेरे हृदय की पुकार को सुनता है। तेरी शक्ति की सौगन्ध!

मेरे अपराधों ने मुझे तेरे समीप आने से रोका है, और मेरे पापों ने मुझे तेरी पावनता के दरबार से बहुत दूर कर रखा है। हे मेरे स्वामी! तेरे प्रेम ने मुझे समृद्ध बनाया है,

और तेरे वियोग ने मुझे निष्प्राण कर दिया है, और तुझसे दूरी ने मुझे नष्ट कर दिया है। इस वीराने में तेरे पदचापों के नाम पर मैं याचना करता हूँ और इन शब्दों से, कि ”मैं यहाँ हूँ“, ”यहाँ हूँ मैं“,

जिन शब्दों को तेरे प्रियजनों ने इस अनंतता के अरण्य में उच्चारा है, तेरे प्रकटीकरण की श्वांसों और तेरे अवतरण के उषाकाल की मृदुल बयारों के नाम पर मैं तुझसे याचना करता हूँ कि ऐसा विधान कर कि मैं तेरे सौन्दर्य के दर्शन कर सकूँ

और जो कुछ भी तेरे पावन ग्रंथ में नियत है उसका अनुपालन कर सकूँ।

*तब वह महानतम् नाम ”अल्लाह-ओ-आभा“ का तीन बार पाठ करे और घुटनों पर हाथ रखते हुए झुके और कहे : तेरा गुणगान हो, हे मेरे ईश्वर।

कि तेरा स्मरण करने और तेरा गुणगान करने में तूने मुझे सहायता दी है,

तूने ही दिया है ज्ञान दिव्य सूर्य के चिह्नों का, तूने ही बनाया है इस योग्य कि नतमस्तक हो सकूँ तुझ परम महान के प्रति और बन सकूँ विनम्र तेरे ईश्वरत्व के प्रति और उसे स्वीकार सकूँ जो तेरी भव्यता की दिव्य वाणी ने उच्चारा है। *तब वह खड़ा हो जाये और कहे : हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! मेरे पापों के बोझ से झुक गई है मेरी कमर;मेरी लापरवाहियों ने मुझे बर्बाद कर दिया है। जब कभी भी मैं अपने दुष्कर्मों के विषय में सोचता हूँ

और सोचता हूँ तेरी दयाशीलता के विषय में तो मेरा हृदय, अन्दर-ही-अन्दर विह्वल हो जाता है,

मेरा रक्त मेरी धमनियों में उद्वेलित हो उठता है। तेरे सौन्दर्य की सौगन्ध, हे तू, विश्व की कामना! लज्जित हूँ मैं तेरी ओर पहुँचने में, याचना भरे अपने हाथ तेरी स्वर्गिक कृपा की ओर फैलाने में। तू देखता है, हे मेरे ईश्वर! कैसे अवरोध बने हैं मेरे आँसू तुझे याद करने में, गुणगान करने में तेरा; हे तू जो इहलोक और परलोक के सिंहासन का स्वामी है ! तेरे साम्राज्य के चिह्नों और तेरी सम्प्रभुता के रहस्यों द्वारा मैं तुझसे याचना करता हूँ कि अपने प्रियजनों के साथ

अपनी अनुकम्पा के अनुरूप चलन रख, हे सबके स्वामी!

*अपनी गरिमा के अनुरूप अपना व्यवहार दे उन्हें, हे गोचर और अगोचर के सम्राट! तब वह तीन बार महानतम् नाम ”अल्लाह-ओ-आभा’ कहे और घुटनों के बल झुककर सर नवाये, फिर कहे :

तेरा गुणगान हो, हे मेरे ईश्वर! कि तूने वह भेजा है हम तक जो

तेरी समीपता की ओर हमें आकर्षित करता है और तेरे पावन ग्रंथ और पवित्र लेखनी में विहित हर मंगल पदार्थ हमें प्रदान करता है।

हम याचना करते हैं, हे मेरे स्वामी! हमें व्यर्थ विचारों और निरर्थक कल्पनाओं से बचा।

तू, सत्य ही, सर्वशक्तिमान है, है सर्वज्ञ।

तब वह अपना सर उठाये, बैठ जाये और कहे : हे मेरे ईश्वर, मैं उसका साक्षी देता हूँ जिसके साक्षी बने हैं तेरे प्रियजन, स्वीकारता हूँ मैं उस सत्य को,

जिसे सर्वमहान स्वर्ग के निवासियों ने

और तेरे शक्तिशाली सिंहासन के चारों ओर विचरण करने वालों ने स्वीकारा है,

पृथ्वी और स्वर्ग का साम्राज्य तेरा ही है हे समस्त लोकों के स्वामी !

महिमा हो तेरी, हे स्वामी, तू जिसने अपने आदेश की शक्ति से सभी सृजित वस्तुओं को अस्तित्व में लाया है। हे स्वामी! जिन्हांने तेरे अतिरिक्त अन्य सब कुछ त्याग दिया है, उनकी सहायता कर और उन्हें महान विजय प्रदान कर। हे स्वामी, अपने सेवकों की सहायता करने के लिये, उन्हें सहयोग और सहायता प्रदान करने के लिये, उन्हें महिमा से आच्छादित करने के लिये, उन्हें सम्मान एवं उच्चता प्रदान करने के लिये, उन्हें समृद्ध बनाने के लिये और अद्भुत विजय के द्वारा उन्हें विजयी बनाने के लिये, ऐसे देवदूतां को नीचे भेज जो स्वर्ग में और धरती पर तथा जो कुछ भी इनके मध्य है, में है। तू उनका स्वामी है, स्वर्ग और धरती का स्वामी है और स्वामी है समस्त लोकों का। हे प्रभु, इन सेवकां की शक्ति के माध्यम से इस धर्म को बल प्रदान कर और संसार के सभी लोगों पर प्रभावी होने में इनकी सहायता कर; क्यांकि, वे सत्य ही, तेरे ऐसे सेवक हैं जिन्होंने स्वयं को तेरे अतिरिक्त अन्य सभी से अनासक्त कर लिया है और वस्तुतः तू सच्चे अनुयायियों का रक्षक है। हे स्वामी, अनुदान दे कि तेरे इस अलंघनीय धर्म के प्रति अपनी निष्ठा के माध्यम से उनके हृदय, उन सभी वस्तुओं से अधिक शक्तिशाली बन जायें, जो स्वर्ग में और धरती पर, तथा जो कुछ भी इनके मध्य है, में है; और हे स्वामी, अपनी अद्भुत शक्ति के चिन्हां से उनके हाथों को बलशाली बना ताकि वे समस्त मानवजाति के समक्ष तेरी शक्ति प्रकट कर सकें।
महिमा हो तेरी, हे प्रभु, मेरे परमेश्वर! तेरे उस नाम पर मैं तुझसे याचना करता हूँ जिसके द्वारा तूने अपने मार्गदर्शन की ध्वजाओं को ऊँचा उठाया है और अपनी स्नेहमयी कृपालुता की कीर्ति-प्रभा बिखेरी है और अपने स्वामित्व की प्रभुसत्ता को प्रकट किया है, जिसके द्वारा अपने नामों का दीपक अपने गुणों के निवास में तूने आलोकित किया है; और जिसके द्वारा वह, जो तेरी एकता का मण्डप-वितान और अनासक्ति के मूर्त्तरूप है, सामने आया है; जिसके माध्यम से तेरे मार्गदर्शन के पथों का ज्ञान हुआ है, तेरी प्रसन्नता के मार्ग रेखांकित किये गये हैं, जिसके द्वारा दोषियों की नींव हिला दी गई है और दुष्टता के चिन्ह मिटा दिये गये हैं, जिसके द्वारा प्रज्ञा के निर्झर स्रोत फूट निकले हैं और स्वर्गिक भोज की पाती भेजी गई है, जिसके द्वारा तूने अपने सेवकों को सुरक्षित रखा है और अपनी सुकोमल दया उनके प्रति प्रकट की है और अपने प्राणियों के बीच अपनी क्षमाशीलता दर्शाई है, उनके नाम पर मैं तुझसे याचना करता हूँ कि जो दृढ़ बना रहा है और जो तुझ तक लौट आया है और तेरी दया की डोर थामे हुए है और तेरे प्रेमपूर्ण मंगल-विधान के परिधान की छोर से लिपटा रहा है, उसे सुरक्षित रख और उसे तेरे द्वारा प्रदान की गई निरन्तरता से, और तेरी इस उदात्त सत्ता से प्रदत्त प्रशांतता से मंडित कर। तू निश्चय ही आरोग्यदाता, संरक्षणकर्ता, सहायक, सर्वशक्तिमान, शक्तिशाली, सर्वमहिमामय, सर्वज्ञाता है।

इस अनिवार्य प्रार्थना का पाठ प्रतिदिन सुबह, दोपहर और शाम के समय किया जाना चाहिये जो भी इस प्रार्थना का पाठ करना चाहे उसे पहले अपने हाथ धो लेने चाहिये और हाथ धोते समय कहना चाहिये : हे मेरे प्रभु! मेरे हाथों को शक्ति दे

कि ये तेरे ग्रंथ को ऐसे दृढ़ संकल्प के साथ थाम सकें कि दुनिया की कोई भी ताकत इन्हें विचलित न कर पाये।

तब इनकी उन सबसे रक्षा कर जो तेरा नहीं है। तू, सत्य ही, शक्तिशाली, परम बलशाली है।

और अपना चेहरा धोते समय उसे कहना चाहिये :

मैं तेरी ओर उन्मुख हुआ हूँ, हे मेरे ईश्वर! मुझे अपनी छवि की ज्योति से आलोकित कर। तेरे अतिरिक्त किसी अन्य की ओर उन्मुख न होने में इसकी रक्षा कर। तब उसे खड़ा हो जाना चाहिये और क़िब्ले

*(आराधना का केन्द्र बिन्दु - बहजी, अक्का) की ओर मुँह करके कहना चाहिये :

स्वयं प्रभु साक्षी है कि उसके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं। प्रकटीकरण और सृष्टि के साम्राज्य उसी के हैं।

सत्यतः उसने ही उसे प्रकट किया है, जो प्रकटीकरण का दिवानक्षत्र है, जिसने सिनाई पर संवाद किया है, जिसके द्वारा सर्वोच्च क्षितिज आलोकित किया गया है,

वह दिव्य तरुवर, जिसके आगे कोई राह नहीं है, बोल उठा है

और जिसने उन सबके लिये जो इस धरती पर और स्वर्ग में हैं, पुकार लगाई है : ”देखो ! सर्वसमर्थ परमेश्वर आ गया है।“

पृथ्वी और स्वर्ग, महिमा और साम्राज्य उसी के हैं। वह सभी वस्तुओं का स्वामी है।

परमोच्च लोक का सिंहासन उसी का है। वही धरती का सम्राट है।“ उसे झुक कर अपने घुटनों के ऊपर हाथ रखकर यह कहना चाहिये :

तू मेरी और मेरे अतिरिक्त

अन्य किसी की प्रशंसा से बहुत ऊपर है। तू मेरे और स्वर्ग में तथा पृथ्वी पर

निवास करने वालों के वर्णन से भी परे है। तब खुले हाथों से हथेली ऊपर करते हुये उसे कहना चाहिये : हे मेरे ईश्वर! उसे निराश न कर जिसने विनम्र हाथों से तेरी दया और कृपा के आंचल को थाम रखा है। हे प्रभु! जो दयालु हैं, उन सबमें तू सर्वाधिक दयालु है। तब वह बैठ जाये और कहे : मैं तेरी एकता और एकमेवता का साक्षी हूँ और इसकी भी साक्षी देता हूँ कि तू ही है ईश्वर और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है। सत्य ही, तूने प्रकट किया है अपना धर्म, पूरा किया है अपना वचन !

तूने उन सबके लिये, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर निवास करते हैं,

अपनी उन्मुक्त कृपा के द्वार खोल दिये हैं। जिन्हें समय के झंझावातों ने

तुझसे विमुख नहीं किया, जो तेरे सान्निध्य की आशा में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर बैठे हैं।

तेरे ऐसे प्रियजनों को आशीष और शांति मिले, नमन हो उनका, उनका यश बढ़े। सत्य ही, तू सदा क्षमाशील, सर्वकृपालु है।

इस लम्बे पद के स्थान पर यदि कोई यह कहना चाहे कि :

”प्रभु साक्षी है कि उसके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, वही है संकटों में सहायक, स्वयंजीवी“ तो यह पर्याप्त होगा और इसी रह बैठने के बाद अगर कोई इतना कहना चाहे कि ”मैं तेरी एकता और एकमेवता का साक्षी हूँ और इसकी भी साक्षी देता हूँ कि तू ही ईश्वर है और तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है“ तो यह पर्याप्त होगा।

महिमावंत हो तेरा नाम, हे मेरे ईश्वर ! तूने उस युग को प्रकट किया है जो युगों का अधिपति है, वह युग जिसे तूने अपने प्रियजनों तथा दिव्य अवतरणों के समक्ष अपनी श्रेष्ठतम पातियों में घोषित किया था, वह युग जब तूने समस्त सृजित वस्तुओं पर अपने नामों की आभा बिखराई थी। उसे प्रदत्त तेरा आशीष महान है जिसने स्वयं को तेरी ओर उन्मुख किया है और तेरा सान्निध्य पा लिया है और तेरी वाणी की प्रखरता को ग्रहण किया है।

मैं तुझसे याचना करता हूँ, हे मेरे स्वामी, तेरे उस नाम से, जिसके चहुँओर नामों का साम्राज्य आराध्य भाव से परिक्रमा करता है, कि तू अपने उन प्रियजनों की सहायता कर जो तेरे सेवकों के मध्य तेरी वाणी की महिमा का बखान करते हैं और दूर-दूर तक तेरे प्राणियों के बीच तेरा यशोगान करते हैं, जिससे तेरी पृथ्वी के निवासियों की आत्माएँ तेरे प्राकट्य के आह्लाद से भर उठीं हैं। हे मेरे नाथ! तूने अपने अनुग्रह की जीवन्त जलधाराओं तक पहुँचने में उनका मार्गदर्शन किया है, उन्हें उदारता से यह वर दे कि वे तुझसे विमुख न हों। तूने उन्हें अपनी सिंहासनस्थली तक बुलाया है, अपनी स्नेहयुक्त दयालुता के द्वारा तू उन्हें अपनी समीपता से दूर न कर। उनके पास वह भेज जो उन्हें तेरे अतिरिक्त अन्य सबसे पूरी तरह अनासक्त कर दे। तू अपनी समीपता के अंतरिक्ष में उड़ान भरने में उन्हें इतना समर्थ बना कि न तो दमनकर्ता के तीव्र प्रहार और न ही तेरी परम पावनता और परम शक्तिमानता में अविश्वास करने वालों के भ्रामक परामर्श उन्हें तुझसे दूर रख सकें।

महिमा हो तेरी, हे स्वामी, मेरे नाथ! मैं तुझसे याचना करता हूँ कि क्षमा कर दे मुझे और उन्हें, जो तेरे धर्म के समर्थक हैं। वस्तुतः, तू सम्प्रभु स्वामी है, क्षमादाता, सर्वाधिक उदार। अपने वैसे सेवकों को, जो ज्ञानविहीन हैं, अपने धर्म को स्वीकार करने के योग्य बना, क्योंकि एक बार यदि वे तेरे बारे में जान जायेंगे तो वे न्याय दिवस की सत्यता के साक्षी बनेंगे और तेरी कृपा के प्रकटीकरण का विरोध नहीं करेंगे। उनके लिये अपनी दया के चिन्ह भेज और वे जहाँ कहीं भी निवास करें उन्हें अपनी उदारता का अंशदान दे, जिसका विधान तूने उनके लिये किया है जो तेरे सेवकों के बीच विशुद्ध हृदय हैं। तू सत्य ही सर्वोपरि सम्राट, सर्वकृपालु, परम करुणामय है। अपनी कृपा और अपने आशीषां की बूंदें बरसने दे वहाँ जिनके निवासियों ने तेरे धर्म को स्वीकार किया है। वस्तुतः, क्षमादान देने में तू सर्वोपरि है। यदि तेरी कृपा उन तक नहीं पहुँच पायेगी तो तेरे इस युग में वे तेरे भक्तों में कैसे गिने जायेंगे। मुझे आशीष दे, हे मेरे ईश्वर! और उन्हें भी जो इस पूर्व निर्धारित युग में तेरे चिन्हों पर विश्वास करेंगे! जो अपने दिलों में तेरा प्यार धारण करते हैं, एक ऐसा प्रेम जिसे तूने ही उन्हें दिया है, उन्हें भी आशीष दे, हे मेरे प्रभु! सत्य ही, तू न्याय का स्वामी है, है सर्वोच्च!
स्तुत्य और महिमावंत है तू, हे परमात्मन्! तेरा पावन सान्निध्य प्राप्त करने का दिवस शीघ्र आये, ऐसा वर दे। अपने प्रेम और प्रसन्नता की शक्ति से हमारे हृदय उल्लसित कर दे और हम स्वेच्छा से तेरी इच्छा और आदेश के प्रति समर्पित हो सकें, ऐसी दृढ़ता प्रदान कर। वस्तुतः तेरे ज्ञान के वृत्त में वे सब हैं, जिनकी रचना तूने की है और जिनकी रचना तू करेगा। तेरी स्वर्गिक शक्ति उन सब के अनुभव से परे है, जिनको तूने अस्तित्व दिया है और जिन्हें तू अस्तित्व देगा। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है, जिसकी आराधना की मेरी कामना है। तेरे अतिरिक्त अन्य नहीं है कोई, जो स्तुत्य है। तेरी सुप्रसन्नता के अतिरिक्त नहीं है कुछ भी जो प्रिय है मुझे। वस्तुतः; तू ही है सर्वोपरि शासक, परम् सत्य, संकटमोचन, स्वयंजीवी।
महिमावंत है तू, हे नाथ, मेरे परमेश्वर! आभार प्रकट करता हूँ मैं तेरा कि तूने मुझे अपने अवतार स्वरूप को पहचानने और अपने शत्रुओं से विरत होने योग्य बनाया है; और तेरे दिनों में उनके, द्वारा किये गये दुष्कर्मों को मेरे सम्मुख खोलकर रख दिया है और उनके प्रति मुझे आसक्तियों से मुक्त किया है और पूर्णतया तेरी दया और कृपामय अनुग्रहों की ओर उन्मुख होने में समर्थ बनाया है। मैं इसके लिये भी तेरा आभार प्रकट करता हूँ कि तूने अपनी इच्छा के मेघों द्वारा मुझ तक वह भेजा है जिसने मुझे अधर्मियों के संकेतों और अविश्वासियों के भ्रांत विचारों से इतना मुक्त कर दिया है कि मैंने अपना हृदय दृढ़ता से तुझमें लगा लिया है और ऐसे लोगों से दूर भाग आया हूँ जिन्होंने तेरे मुखारबिन्द के प्रकाश को नकार दिया है। तब मैं पुनः आभार प्रकट करता हूँ तेरा कि तूने मुझे अपने प्रेम में दृढ़ रहने का, तेरी जयजयकार करने का, तेरा गुणगान करने का, और तेरे उस कृपा-पात्र से पान करने का अवसर दिया है जो सभी दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के ऊपर है। तू सर्वशक्तिशाली, परम उदात्त, सर्वमहिमाशाली, सभी को प्रेम करने वाला है।

महिमामय है तू, हे नाथ, मेरे परमेश्वर! जितनी बार भी मैं तेरा नाम लेने का प्रयत्न करता हूँ, मैं प्रबल पापों और तेरी इच्छा के विरूद्ध किये गये कर्मों को याद करता हूँ और पाता हूँ अपने आपको इतना शक्तिविहीन कि तुम्हारा गुणगान भी नहीं कर पाता। लेकिन तेरी अनुकम्पा में मेरा परम विश्वास, तुझमें मेरी आशा को पुनर्जीवन देता है और मेरा यह विश्वास कि कुछ भी हो जाये तू कृपा ही देगा, मुझे तेरी ओर उन्मुख होने, तेरा गुणगान करने में और याचना भरे हाथ तेरी ओर फैलाने में समर्थ बनाता है। हे मेरे नाथ! मैंं तेरी उस दया की याचना करता हूँ जो सभी सृजित वस्तुओं में श्रेष्ठ है और जिसके साक्षी हैं वे सभी जो तेरे नाम के महासिंधु की अतल गहराइयों में निमग्न हैं। हे मेरे नाथ! मुझे मेरे ऊपर मत छोड़, क्योंकि मेरा मन दुष्कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है। अपनी सुरक्षा के दुर्ग में मुझे शरण दे, मेरी रक्षा कर! मैं वह हूँ, हे मेरे प्रभु! जो तेरी इच्छा के अनुरूप चलना चाहता है, मैंने उसका ही वरण किया है जो तेरे विधानों और तेरी इच्छा के अनुरूप है। मैने वही चाहा है जो तेरे आदेश और निर्णय के प्रतीक हैं। हे प्रभु! इतनी अनुकम्पा कर मेरे ऊपर; हे तू जो उन हृदयों को प्रिय है, जो तेरी कामना करते हैं ! तेरे धर्म के प्रकटीकरण, तेरी प्रेरणा के दिवास्त्रोत, तेरी भव्यता के प्रवक्ता, तेरे ज्ञान के कोषालय के नाम पर मैं याचना करता हूँ कि अपने पवित्र निवास से मुझे वंचित मत कर, अपने मंदिर और मण्डप वितान से मुझे दूर मत रख। वर दे, हे मेरे स्वामी! कि तुम्हारे गरिमामय दरबार तक पहुँच पाऊँ, उसकी ही परिक्रमा करूँ और तुम्हारे द्वार पर विनम्र बन खड़ा रहूँ।

तू वह है, जिसकी शक्ति अनन्तकाल से है। कुछ भी तेरे ज्ञान से परे नहीं। तू सत्य ही शक्ति का परमेश्वर, महिमा और प्रज्ञा का प्रभु है। ईश्वर का गुणगान हो, जो सभी लोकों का स्वामी है।

*(अधिदिवस उपवास माह के पहले आते हैं और उपवास की तैयारी के दिन होते हैं, ये अतिथि-सत्कार, दान और उपहार देने के दिन होते हैं।)

मेरे ईश्वर, मेरी महाज्वाला और मेरी महाज्योति! वे दिन प्रारम्भ हो गये हैं जिन्हें तूने अपने ग्रंथ में ”अय्याम-ए-हा“ के दिन कहा है। हे तू, जो नामों का अधिपति है, वह उपवास निकट आ रहा है, जिसे करने का आदेश तेरी परमोच्च लेखनी ने उन सभी को दिया है जो तेरी सृष्टि के साम्राज्य में निवास करते हैं। इन दिनों के नाम पर और उन सबके नाम पर जो इस दौरान तेरे आदेशों की डोर को दृढ़ता से थामे रहे हैं और जो तेरी शिक्षाओं से अभिभूत हैं, मैं विनती करता हूँ तुझसे, हे मेरे नाथ, कि प्रत्येक आत्मा के लिये अपने दरबार में एक स्थान नियत कर और तेरे मुखारबिंद की ज्योति की भव्यता के प्रकटीकरण में प्रत्येक को एक आसन दे। हे नाथ! तुमने अपनी परम पावन पुस्तक में जो भी विहित किया है उनसे विमुख नहीं कर पाई है उन्हें कोई भी भ्रष्ट प्रवृत्ति। ये तेरे धर्म के सम्मुख नत हुए हैं और तेरे परम पावन ग्रन्थ का इन्होंने ऐसे दृढ़ संकल्प से स्वागत किया है जो संकल्प स्वयं तुझसे जन्म लेता है। तूने उनके लिये जो भी आदेश दिया है उसका इन्‍होंने पालन किया है और जो कुछ तेरे द्वारा भेजा गया है उसके अनुसरण को चुना है। देखता है तू, हे मेरे नाथ, कैसे उन्होंने तेरे द्वारा तेरे पावन ग्रंथों में प्रकटित सब कुछ को पहचाना और स्वीकार किया है। उन्हें, हे मेरे नाथ, अपनी कृपालुता के हाथों से अपनी चिरंतनता की जलधाराएँ पीने दे और तब उनके लिये वह पुरस्कार लिख दे जो तेरे सान्निध्य के महासिंधु में निमग्न होने वालों के लिये और तुझसे मिलन की श्रेष्ठ सुरा को प्राप्त करने वालों के लिये नियत किया गया है। मैं याचना करता हूँ तुझसे, हे राजाधिराज! कि उनके लिये इस लोक और उस लोक का मंगल विधान कर और उनके लिये वह अंकित कर जो तेरा कोई भी प्राणी नहीं खोज पाया है और उनकी गिनती ऐसे लोगों के साथ कर जिन्होंने तेरे चारों ओर परिक्रमा की है और जो तेरे लोकों में से प्रत्येक लोक में, तेरे सिहांसन के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। तू सत्य ही, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञाता, सर्वसूचित है।

हे मेरे ईश्वर, मैं नहीं जानता, कि वह कौन सी अग्नि है जो तूने अपनी धरा पर प्रज्वलित की है। धरती कभी भी इसके तेज को आच्छादित नहीं कर सकती और न जल इसकी अग्नि को बुझा सकता है। संसार के समस्त निवासी भी इसके वेग को बाधित करने में असमर्थ हैं। वह जो इसके निकट खिंच आया है और इसकी गर्जना को जिसने सुना है उसे प्राप्त आशीर्वाद महान हैं।

हे मेरे ईश्वर, कुछ को, तूने अपनी शक्तिदायिनी कृपा के द्वारा इसकी ओर आने के योग्य बनाया है, जबकि दूसरों को इस कारण जो तेरे दिवस में उनके हाथों ने किया है, पीछे रखा है। जिसने भी शीघ्रता से इसकी ओर पग बढ़ाये हैं और तेरे सौन्दर्य को निहारने की उत्कंठा में जो भी तुझ तक पहुँचा है, उसने तेरे पथ में अपना जीवन न्योछावर कर दिया है और तेरे अतिरिक्त अन्य सब कुछ से पूर्णतया अनासक्त होकर तुझ तक पहुँच गया है।

मैं याचना करता हूँ कि उस ज्वाला से जो तेरी सृष्टि में प्रज्ज्वलित हुई है, उन पर्दों को विदीर्ण कर दे, जिन्होंने मुझे तेरी भव्यता के सिंहासन के सम्मुख उपस्थित होने और तेरे प्रवेश-द्वार पर खड़ा होने से रोक रखा है। हे मेरे ईश्वर! मेरे लिये अपने ग्रंथ में विहित प्रत्येक उत्तम वस्तु का विधान कर और मुझे अपनी दया की शरण से दूर हटाये जाने का दुःख न दे। तू जैसा चाहे वैसा करने में सक्षम है; तू निश्चय ही, सर्वशक्तिशाली, परम उदार है।

हे मेरे ईश्वर! अपनी अनन्तता की सुवासित जलधाराओं में से मुझे पान करने दे और अपने अस्तित्व के वृक्ष के फलों का स्वाद चखने योग्य मुझे बना, हे मेरी आशा! मुझे अपने प्रेम के स्फटिक निर्मल झरनों से घूंट भरने दे मुझे, हे मेरी महिमा! और अपने अनन्त मंगल विधान की छत्रछाया में मुझे विश्राम करने दे, हे मेरी ज्योति! अपनी निकटता के उपवन में, अपने सान्निध्य में, मुझे विश्राम करने योग्य बना, हे मेरे प्रियतम! और अपने सिंहासन की दाहिनी भुजा पर मुझे बैठा, हे मेरी कामना अपने उल्लास के सुवासित झकोरों का एक झोंका मुझ पर से बह जाने दे, हे मेरे लक्ष्य! अपने सत्य के आकाश की ऊँचाइयों में मुझे प्रवेश पाने दे, हे मेरे आराध्य! अपनी एकता की दिव्य कोकिला की मधुर स्वर-लहरी को सुन पाने का अवसर दे मुझे, हे देदीप्यमान ईश्वर! अपनी शक्ति और सामर्थ्‍य की चेतना से मुझे अनुप्राणित कर दे, हे मेरे विश्वम्भर! अपने प्रेम में मुझे अटल बना, हे मेरे सहायक! और अपनी सुप्रसन्नता के पथ में मेरे पगों को अडिग रख, हे मेरे स्रष्टा! अपनी अमरता के उपवन में, अपने मुखारविन्द के सम्मुख सदा निवास करने दे मुझे, हे तू जो सदासर्वदा मुझ पर दयालु है! और अपनी महिमा के आसन पर मुझे प्रतिष्ठित कर, हे तू, जो मेरा स्वामी है! अपनी प्रेममयी कृपा के आकाश तक मुझे उड़ान भरने दे, हे मेरे जीवनाधार! और अपने मार्गदर्शन के सूर्य से मेरा पथ आलोकित कर, हे मनमोहन! अपनी अदृश्य चेतना से मेरा साक्षात्कार करा, हे तू जो मेरा उद्गम है और मेरी सर्वोपरि इच्छा है; और अपने सौन्दर्य की सुरभि के सार तक मुझे लौटने दे, हे तू जो मेरा ईश्वर है! तुझे जो प्रिय है, वह करने में तू समर्थ है। तू, सत्य ही, परम उदात्त, सर्वमहिमामय, सर्वोच्च है।

स्तुति हो तेरी, हे नाथ, मेरे परमेश्वर! तू देखता है और जानता है कि मैंने तेरे सेवकों का अन्य किसी ओर नहीं, बल्कि बस तेरी कृपा की ओर उन्मुख होने का आह्वान किया है और इन्हें उन आदेशों का पालन करने को कहा है जो तेरे अबोधगम्य निर्णय और अटल उद्देश्य के द्वारा भेजे गये हैं।

हे मेरे परमेश्वर! जब तक तेरी अनुमति न हो मैं एक शब्द भी नहीं बोल सकता और किसी भी ओर जा नहीं सकता जब तक तेरी स्वीकृति न मिले। यह तू ही है मेरे परमात्मन् जिसने अपनी सामर्थ्य की शक्ति से मुझे अस्तित्व दिया है और अपने धर्म का संदेश देने के लिये अपनी कृपा प्रदान की है। इसी कारण मुझ पर टूटी हैं विपत्तियाँ इतनी कि मेरी जिह्वा पर तेरा यशगान करने और तेरी महिमा का जयघोष करने से रोक लगा दी गई है।

समस्त स्तुति तेरी हो, हे मेरे परमेश्वर ! उन सब के लिये जिसका विधान अपने आदेश और अपनी सम्प्रभुता की शक्ति से तूने किया है, मैं तुझसे याचना करता हूँ कि तू मेरे और निज प्रेमियों के लिये अपने प्रेम को सुदृढ़ रख। तुझे तेरी सामर्थ्य की सौगंध, हे मेरे परमेश्वर! एक पर्दे के कारण तुझसे दूर होकर मैं लज्जित हूँ। मेरा गौरव तो इसी में है कि तुझे जानूं। तेरे नाम का शक्ति-कवच पहन लेता हूँ जब, तब कोई भी चोट आघात नहीं पहुँचा पाती और मेरे हृदय में जब तेरा प्रेम भरा होता है तब संसार भर की विपदाएँ भी मुझे विचलित नहीं कर पातीं। अतः, हे मेरे ईश्वर! वर दे कि तेरे सत्य का खंडन करने वालों और तेरे चिन्हों में अविश्वास करने वालों से मेरी रक्षा हो सके। तू ही, वस्तुतः, सर्वमहिमाशाली, सर्वकृपालु है।

स्तुति हो तेरी, हे प्रभु, मेरे परमेश्वर! तेरे इस धर्म प्रकटीकरण के नाम पर, जिसके द्वारा अंधकार ने प्रकाश का रूप लिया है, जिसके द्वारा बारम्बार धर्मध्वजा लहराई गई है और विहित पाती का प्रकटीकरण हुआ है और वह विस्तारित नामावली अनावृत हुई है, मैं तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे उपवास और उन्हें, जो मेरे संगी हैं, वह प्रदान कर जो हमें तेरी सर्वातीत महिमा के व्योम में ऊँचे विचरण करने में समर्थ बनाये और हमें ऐसे सन्देहों के कलुष से मुक्त कर दे जिन्होंने शंकाशील लोगों को तेरी एकता की छत्रछाया में आने से रोका है। मैं वह हूँ, हे मेरे प्रभु, जिसने तेरी स्नेहमयी कृपालुता की डोर को मजबूती से थामा हुआ है और जो तेरी दया और तेरे अनुग्रहों के आंचल से लिपटा हुआ है। तू मेरे और मेरे प्रियजनों के लिये इहलोक और परलोक के शुभ पदार्थों का विधान कर और तब उन्हें वह गुप्त उपहार प्रदान कर जिसका विधान तूने अपने सबसे चुने हुए प्राणियों के लिये किया है। ये वे दिन हैं, हे मेरे प्रभु, जिनमें तूने अपने सेवकों को उपवास रखने का आदेश दिया है। भाग्यशाली हैं वे जो केवल तेरे लिये और तेरे अतिरिक्त अन्य सभी पदार्थों से पूर्णतया अनासक्त होकर, उपवास धारण करते हैं। मेरी सहायता कर और उन्हें भी सहायता दे, हे मेरे प्रभु! कि हम तेरी आज्ञा का पालन करें और तेरी शिक्षाओं पर चलें। सत्य ही तू अपनी इच्छानुसार सब कुछ करने की सामथ्र्य रखता है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई परमेश्वर नहीं है। तू सर्वज्ञाता, सर्वप्रज्ञ है। सर्वस्तुति हो उस परमेश्वर की, अखिल लोकों के उस प्रभु की।

तेरे ही नाम की स्तुति हो, हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! मैं तेरा वह सेवक हूँ जिसने तेरी करुणामयी दया के आँचल को थाम लिया है और जो तेरी असीम दातारपन के आंचल से लिपट गया हूँ। तेरे नाम से जिसके द्वारा तूने सृष्टि की समस्त दृश्य तथा अदृश्य वस्तुओं को अपने अधीन किया है और जिसके द्वारा यह श्वांस, जो वस्तुतः जीवन ही है, समस्त सृष्टि में प्रवाहित की गई है, मैं याचना करता हूँ कि तू धरती तथा आकाश को आवृत करने वाली अपनी शक्ति से मुझे सबल बना और समस्त विपदाओं एवं रोगों से मेरी रक्षा कर। मैं साक्षी देता हूँ कि तू ही समस्त नामों का स्वामी है और तू वैसी ही आज्ञा देने वाला है जो तुझे प्रिय हो, तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, सर्वशक्तिशाली, सर्वज्ञाता, सर्वप्रज्ञ!

हे मेरे स्वामी! मेरे लिये उसका विधान कर जो तेरे प्रत्येक लोक मे मेरे लिये कल्याणकारी हो। और तब मेरे लिये वह भेज जो तूने अपने चुने हुए प्राणियों के लिये निर्धारित किया है: ऐसे प्राणी, जिन्हें न तो दोष देने वालों का दोषारोपण, न ही अधर्मियों का कोलाहल और न ही तुझसे विमुख प्राणियों की आसक्तियाँ तेरी ओर उन्मुख होने से रोक सकी है।

तू सत्य ही, अपनी सर्वोपरि सत्ता से, संकट में सहायक है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, परम बलशाली, सर्वशक्तिमान।

परमेश्वर, जो सभी अवतारों का प्रणेता है, सभी उद्गमों का मूल है, सभी धर्मों का जनक है, समस्त प्रकाशपुंजों का स्त्रोत है, मैं साक्षी देता हूँ कि तेरे नाम से बोध का स्वर्ग विभूषित हुआ है, वाणी का महासिंधु उमड़ा है और सभी धर्मों के अनुयायियों के बीच तेरे मंगलविधान का शासन लागू हुआ है।

मैं याचना करता हूँ तुझसे कि मुझे इतना समृद्ध बना दे कि मैं तेरे सिवा अन्य सब से मुक्त हो जाऊँ और तेरे अतिरिक्त अन्य किसी पर आश्रित न रहूँ। तब मुझ पर अपनी कृपा के मेघों की वह बरखा बरसा जो तेरे लोकों के हर लोक में लाभकारी हो। तब अपनी शक्तिदायिनी अनुकम्पा द्वारा मेरी ऐसी सहायता कर कि मैं तेरे सेवकों के बीच तेरे धर्म की सेवा कर सकूँ और कुछ ऐसा कर दिखाऊँ कि जब तक तेरा साम्राज्य और तेरी सम्प्रभुता है तब तक मैं याद किया जाऊँ।

यह तेरा सेवक है, हे मेरे स्वामी ! जो तेरी कृपा के क्षितिज और तेरे उपहारों के स्वर्ग की ओर पूर्ण समर्पण के साथ उन्मुख हुआ है। तू सत्य ही, शक्ति और सम्पन्नता का स्वामी है। तू उसकी सुनता है जो तेरा गुणगान करता है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, तू सर्वज्ञ सर्वप्रज्ञ है।

जयघोष हो तेरे नाम का, हे नाथ, मेरे परमेश्वर! अंधियारा छा गया है समस्त भू पर और दुष्ट शक्तियों ने घेर लिया है सभी राष्ट्रो को। इसमें भी मैं देखता हूँ तेरे ही विवेक को और पाता हूँ तेरे विधान की चमक। वे जो तुझसे दूर आवरण में लिपटे हैं, समझ लिया है उन्होंने कि शक्ति है उनमें तेरे प्रकाश को बुझा देने की और तेरी अग्नि को मिटा देने की और तेरी कृपा के पवन झकोरों को रोक लेने की। किन्तु नहीं, तेरी प्रभुता मेरी साक्षी है यदि प्रत्येक विपदा तेरे विवेक और प्रत्येक अग्नि-परीक्षा तेरे मंगल-विधान का संवाहक नहीं बनाई गई होती तो हमारा विरोध करने का साहस कोई भी नहीं दिखाता, भले ही धरती तथा स्वर्ग की समस्त शक्तियाँ हमारे विरोध में खड़ी हो जातीं। यदि मैं तेरे विवेक के अद्भुत रहस्यों को, जो खुले पड़े हैं सम्मुख मेरे, प्रकट कर देता तो तेरे शत्रुओं के साम्राज्य विदीर्ण जाते। अतः, महिमा हो तेरे नाम की, हे मेरे परमेश्वर! याचना करता हूँ मैं तुझसे, तेरे परम महान नाम के द्वारा कि जो तुझसे प्रेम करते हैं, उन्हें अपने उस विधान के चारो ओर एकत्र कर जो तेरी इच्छा की सद्कृपा से प्रवाहित है, और उनके लिये वह भेज जो उनके हृदयों को आश्वस्त करे। तू जो भी चाहता है वह करने में समर्थ है। तू ही वस्तुतः, संकट में सहायक, स्वयंजीवी है।

तू महिमावंत है, हे मेरे ईश्वर! मैं धन्यवाद देता हूँ तुझे कि तूने मुझे उसका ज्ञान कराया, जो तेरी दया का उद्गमस्थल है, जो तेरी अनुकम्पा का उदयस्थल है और जो तेरे धर्म का कोषागार है। जिस नाम के स्मरण मात्र से उनके चेहरे दीप्तिमान हो उठते हैं, जो तेरे समीप हैं और उनके हृदय-पखेरू तुझ तक पहुँचने के लिये तड़प उठते हैं, जो तेरे भक्त हैं। मैं तेरे उस नाम के सहारे याचना करता हूँ कि यह वर दे कि प्रतिपल, प्रत्येक परिस्थिति में तेरी डोर को थामे रहूँ और तुझे छोड़कर अन्य सबकी आसक्ति से मुक्त हो जाऊँ और तेरे प्रकटीकरण की ओर एकटक देखता रहूँ और तूने जो अपनी पातियों में विहित किया है उसका अनुपालन कर सकूँ। हे मेरे ईश्वर! मेरे बाह्य और अन्तर्मन को अपनी अनुकम्पा और प्रेममय दया के परिधान से सुसज्जित कर। मुझे सुरक्षित रख और तुझे जो कुछ भी अप्रिय है उससे दूर रख और अपनी आज्ञाओं के अनुपालन में कृपापूर्ण मेरी और मेरे प्रियजनों की सहायता कर और मेरे अंदर जो भी विषय-प्रवृत्ति और दुष्काम भाव हैं उन पर विजय पाने में मेरी सहायता कर।

तू सत्य ही, समस्त मानवजाति का ईश्वर है, और इहलोक और परलोक का स्वामी है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, सर्वज्ञ,

सर्वस्तुति हो तेरी, हे मेरे ईश्वर! तू, जो समस्त महिमा और भव्यता का, महानता और गौरव का, सम्प्रभुता और साम्राज्य का, उच्चता और कृपालुता का, विस्मय और शक्ति का उद्गम है। जिसे भी तू चाहे उसे अपने परम सनातन नाम को स्वीकारने का गौरव प्रदान करता है। स्वर्ग और धरती के समस्त वासियों में से कोई भी रोक नहीं सकता तेरी सम्प्रभु इच्छा को पूरा होने से। चिरंतन काल से तूने किया है शासन सम्पूर्ण सृष्टि पर और रहेगा तेरा ही साम्राज्य सदा समस्त सृजित वस्तुआेंं पर। तुझ सर्वसामर्थ्यवान, परम उदात्त सर्वशक्तिशाली सर्वप्रज्ञ के अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है।

अपने सेवकों के मुखड़ां को दीप्त कर दे और निर्मल कर दे उनके हृदय को कि वे तेरे स्वर्गिक अनुग्रहों की ओर उन्मुख हो सकें और पहचान सकें उसे जो तेरा और तेरे दिव्य सारतत्व का अरुणोदय है। वस्तुतः, तू ही है समस्त लोकों का स्वामी! तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, अबाधित, सर्ववशकारी।

तेरे नाम का गुणगान हो, हे मेरे परमेश्वर! और सभी वस्तुओं के परमेश्वर! मेरे गौरव, और सभी वस्तुओं के गौरव! मेरी कामना और सभी वस्तुओं की कामना! मेरी शक्ति और सभी वस्तुओं की शक्ति! मेरे सम्राट, और सभी वस्तुओं के सम्राट! मेरे स्वामी और सभी वस्तुओें के स्वामी! मेरे लक्ष्य और सभी वस्तुओं के लक्ष्य! मुझे गति देने वाले और सभी वस्तुओं के गतिदाता! मैं तुझसे याचना करता हूँ कि अपनी मृदुल कृपा के महासिंधु से मुझे वंचित नहीं रखना, न ही कर देना अति दूर अपनी निकटता के तटों से। तेरे सिवा नहीं है कुछ भी जो मुझको देता हो लाभ। तेरी समीपता से बढ़कर और किसी से प्राप्य नहीं कुछ भी। मैं विनती करता हूँ तेरी विपुल समृद्धि के नाम पर, जिसके द्वारा छोड़ स्वयं को तू, कर देता है सबकुछ दान, कि मुझको उनमें गिन जिन्होंने अपना मुखड़ा तेरी ओर कर लिया है और उठ खड़े हुए हैं तेरी सेवा में। हे मेरे स्वामी, अपने सेवकों और अपनी सेविकाओं को क्षमा का दान दे दे। तू है सदा क्षमाशील, और परम कृपालु !

हे ईश्वर! तेरे धर्म की ऊष्मा ने अनेक अचेत हृदयों को प्रदीप्त किया है और तेरी वाणी के माधुर्य ने अनेक सोये हुए लोगों को जगाया है। न जाने कितने ऐसे अनजाने लोग हैं, जिन्होंने तेरी एकता के तरुवर की छाया में आश्रय चाहा है और न जाने कितने ऐसे प्यासे लोग हैं जो तेरे इस दिवस में तेरी जीवंत जलधारा की ओर आकुल हो दौड़ पड़े हैं।

वह धन्य है जो तेरी ओर उन्मुख हुआ है और जिसने तेरी मुख-ज्योति के उद्गमस्थल की उपस्थिति पाने की शीघ्रता की है। धन्य है वह जो पूर्ण स्नेह से तेरे प्राकट्य के उदयस्थल की ओर, तेरी प्रेरणा के निर्झरस्रोत की ओर उन्मुख हुआ है। धन्य है वह जिसने तेरे पथ में तेरी उदारता और कृपा से प्राप्त अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया है। धन्य है वह जिसने तुझे पाने की उत्कट चाह में तेरे सिवा अपना सर्वस्व त्याग दिया है। धन्य है वह जिसने तेरी अंतरंग घनिष्ठता का सुख पाया है और जो सिवाय तेरे सब कुछ से विरक्त हो गया है।

मैं याचना करता हूँ, हे मेरे नाथ ! उसके माध्यम से जो तेरा ’नाम‘ है, तेरी ही सत्ता से जो उसके कारागार के क्षितिज पर उदित हुई है, कि तू सबको वह प्रदान कर जो तू उचित समझता है और जो तेरे परम पद के अनुरूप है। वस्तुतः, तेरी शक्ति सर्वोपरि है।

प्रतापशाली है तू, हे नाथ, हे मेरे परमेश्वर! अंतर्दृष्टि से सम्पन्न हर व्यक्ति तेरी सम्प्रभुता और तेरे अधिराज्य को करता है स्वीकार और देख पाता है प्रत्येक विवेकशील नेत्र तेरे वैभव की महानता और सामर्थ्य की बाध्यकारी शक्ति। उन्हें रोक सकने में असमर्थ हैं परीक्षाओं के प्रचंड पवन, जो निहार कर तेरी महिमा के क्षितिज को, पाते हैं आनन्द तेरी निकटता का; जिन्होंने तेरी इच्छा के प्रति स्वयं को पूरी तरह कर दिया है समर्पित, उन्हें तेरे दरबार से दूर रख पाने में या वहाँ पहुँचने में बाधा बनने में संकटों के झंझावात भी हो जाते हैं विफल। ऐसा लगता है कि उनके हृदय में प्रज्ज्वलित हैं तेरे प्रेम के दीपक और ललक उठी है तेरी मृदुलता की ज्योति उनके वक्ष में। विपदायें भी उन्हें तेरे धर्म से विमुख करने में असमर्थ हैं और भाग्य के उलट-फेर भी नहीं भटका सकते हैं उनको तेरी सुप्रसन्नता के पथ से। मैं तुझसे याचना करता हूँ हे मेरे ईश्वर, उनके द्वारा और उनकी उन आहों के द्वारा जो तेरे वियोग में उनके हृदय से निकली हैं, कि उन्हें अपने विरोधियों के दुष्कृत्यों से सुरक्षित रख और उनकी आत्मा को उससे पोषित कर जिसका विधान तूने अपने उन प्रियजनों के लिये किया है जिन्हें कोई भय त्रस्त नहीं करता और जिन पर कोई विपदा नहीं आयेगी।
जयघोष हो तेरे नाम का, हे नाथ, मेरे ईश्वर! तू वह है जिसकी आराधना करती हैं सभी वस्तुएँ, जो करता नहीं आराधना किसी की, जो स्वामी है सबका, जो अधीन नहीं है किसी के, जो ज्ञाता है सबका और जो ज्ञात नहीं है किसी को भी। तूने मनुष्यों के बीच अपनी पहचान चाही थी और इसलिये अपने मुख से निकले एक शब्द से अस्तित्व दिया था तूने सृष्टि को, स्वरूप दिया था ब्रह्माण्ड को। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, स्वरूपदाता, स्रष्टा, सामर्थ्यवान्, सर्वशक्तिवान्। तेरी इच्छा के क्षितिज पर प्रकाशमान इस एक शब्द के द्वारा मैं तुझसे याचना करता हूँ कि मुझे उस जीवन-जल को ग्रहण करने के योग्य बना जिसके द्वारा तूने अपने प्रियजनों के हृदयों को अनुप्रणित और आत्माओं को चैतन्य किया है; ताकि मैं हर समय हर परिस्थिति में पूर्णतया तेरी ही ओर उन्मुख रहूँ। तू शक्ति का, महिमा का और कृपा का परमेश्वर है। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं है, तू सर्वोच्च शासक, महिमाशाली, सर्वदर्शी है।

हे तू, जिसका मुखड़ा है मेरी आराधना का केन्द्र, जिसका सौन्दर्य है मेरा अभयस्थल, जिसका आवास है मेरा लक्ष्य, जिसकी स्तुति है मेरी आशा, जिसका मंगल विधान है मेरा सहचर, जिसका प्रेम है मेरे अस्तित्व का कारण, जिसका स्मरण है मेरा भरोसा, जिसकी निकटता है मेरी कामना, जिसकी समीपता है मेरी सर्वाधिक प्रिय इच्छा और सर्वोच्च आकांक्षा। मैं प्रार्थना करता हूँ तुझसे कि मुझे उन वस्तुओं से वंचित मत कर, जिसका विधान तूने अपने चुने हुए सेवकों के लिये किया है। अतः, मुझे इहलोक और परलोक का शुभ प्रदान कर।

सत्यतः, तू ही है, समस्त मानवजाति का सम्राट। तू सदा क्षमाशील है, परम उदार, तेरे सिवा अन्य कोई ईश्वर नहीं है !

*बहाउल्लाह प्रकट की गई दैनिक अनिवार्य प्रार्थनाएँ संख्या में तीन हैं। प्रत्येक बहाई को चाहिये कि इनमें से कोई एक प्रार्थना वह चुन ले और अनिवार्य रूप से उसका पाठ प्रतिदिन करे। अनिवार्य प्रार्थना का पाठ उनके साथ दिये गये विशेष निर्देशों के अनुसार ही करना चाहिये।

*”अनिवार्य प्रार्थनाओं के सिलसिले में ’सुबह‘ ’दोपहर‘ और ’संध्या‘ का अर्थ है सूर्योदय से दोपहर तक, दोपहर से सूर्यास्त तक और सूर्यास्त से लेकर सूर्यास्त के दो घंटे बाद तक का समय।“

चौबीस घंटे में एक बार, दोपहर से शाम के बीच इस प्रार्थना का पाठ करना चाहिये।

मैं साक्षी देता हूँ, हे मेरे ईश्वर! कि तुझे जानने और तेरी आराधना करने हेतु तूने मुझे उत्पन्न किया है। मैं इस क्षण अपनी शक्तिहीनता और तेरी शक्तिमानता, अपनी दरिद्रता तथा तेरी सम्पन्नता का साक्षी हूँ। तेरे अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर नहीं, तू ही है संकटों में सहायक, स्वयंजीवी।