Selections from the Writings of 'Abdu'l-Bahá
Hindi ·
Ziyarat-Namih (Tablet of Visitation) AB03082
*यह प्रार्थना अब्दुल-बहा द्वारा प्रकटित की गई है और उनकी समाधि पर पढ़ी जाती है। यह व्यक्तिगत प्रार्थना के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है। अब्दुल-बहा ने कहा हैः *”…..जो भी इस प्रार्थना को विनम्रता और गहरी भक्ति से पढ़ेगा वह इस सेवक के हृदय को आनन्द, प्रसन्नता और उल्लास प्रदान करेगा,…..उससे साक्षात् मिलने के समान होगा।“
वह सर्वमहिमामय है! हे ईश्वर, मेरे ईश्वर! दीन और अश्रुपूरित मैं अपने याचक हाथ तेरी ओर फैलाता हूँ और अपना मुखड़ा तेरे द्वार की उस धूल से मंडित करता हूं, जो विद्वानों के ज्ञान और उन सबकी स्तुति से परे है, जो तेरा महिमागान करते हैं। अपने द्वार पर खड़े अपने दीन और विनीत सेवक को अनुग्रहपूर्वक देख, उस पर अपनी करुणा भरी आँखों की तीर्थयात्रा की प्रार्थना दयादृष्टि डाल और उसे अपनी अनन्त कृपा के सागर में निमग्न कर दे। हे नाथ! यह तेरा दीनहीन सेवक है, विनीत, पूरी आस्था के साथ तेरे ही हाथों में अपने आपको समर्पित करते हुए, अत्यन्त भक्तिभाव से, आँसू भरे नयन के साथ तुझे पुकार रहा है और कह रहा है: हे नाथ, मेरे परमेश्वर! मुझे अपने प्रियजनों की सेवा करने की कृपा प्रदान कर, अपने प्रति मेरे सेवाभाव को दृढ़ कर, अपनी पावनता के दरबार और महिमामय भव्य साम्राज्य में स्तुति और प्रार्थना के प्रकाश से मेरा मस्तक आलोकित कर दे और अपनी महिमा के साम्राज्य की प्रार्थना की ज्योति प्रदीप्त कर दे। अपने स्वर्गिक प्रवेश द्वार पर स्वार्थविहीन बनने में मेरी सहायता कर और अपनी पवित्र सीमा में सभी वस्तुओं से अनासक्त रहने में मुझे समर्थ बना दे। हे नाथ, निःस्वार्थता के पात्र से मुझे पान करने दे, निःस्वार्थता का ही वस्त्र मुझे पहना और इसके महासिंधु में निमग्न कर दे मुझको। बना दे मुझे अपने प्रियजनों की राहों की धूल और मुझे ऐसा दान दे कि मैं, अपनी आत्मा उस धरती के लिये बलिदान कर सकूँ जिस पर, तेरी राह में तेरे प्रियजन चले हों, हे सर्वोच्च महिमा के स्वामी! इस प्रार्थना के द्वारा तेरा यह सेवक तुझे दिन-रात पुकारता है, इसके हृदय की अभिलाषा पूरी कर दे, हे स्वामी! इसके हृदय को प्रकाशित कर दे, इसके अंतर को आनंदित कर दे, इसकी ज्योति जला दे, ताकि यह तेरे धर्म और तेरे सेवकों की सेवा कर सके। तू ही दाता है, करुणामय है, परम दयालु, है कृपालु!